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कब बैंक का लोन बनता है NPA और कैसे पड़ता है आम जनता पर इसका असर? जानिए

नई दिल्ली (हरिकिशन शर्मा)। एक व्यावसायिक बैंक मुख्यत: दो प्रकार के काम करता है। बैंक अपने ग्राहकों को लोन देता और उनसे जमाराशियां स्वीकार करता है। ऐसा करते समय बैंक विभिन्न परिसंपत्तियों में निवेश भी करता है। बैंक अमूमन व्यक्तियों व कंपनियों को धनराशि उधार देता है लेकिन उधार बांटी गई उस राशि में से कुछ धनराशि एनपीए (नॉन परफॉमिर्ंग असेट्स) बन जाती है। सरल शब्दों में कहें तो जब ग्राहक बैंक का कर्ज समय पर नहीं चुकाते हैं तो वह फंसा हुआ कर्ज एनपीए में तब्दील हो जाता है।

 

तीन मासिक किश्त अटकी तो एनपीए हो जाता है लोन एकाउंट

 

भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार बैंक को जब किसी परिसंपत्ति (असेट्स) से आय अर्जित होना बंद हो जाती है तो उसे एनपीए मान लिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति ने कार खरीदने के लिए बैंक से ऑटो लोन लिया। अगर वह व्यक्ति किसी कारणवश लगातार तीन महीने तक मासिक किश्तों का भुगतान नहीं कर पाता है तो बैंक को अपने बही-खाते में यह राशि एनपीए के रूप में दर्ज करनी होगी। बैंकों का एनपीए दो स्थिति में बढ़ता है। पहली, जब अर्थव्यवस्था में कारोबार सुस्त रहता है। दूसरी, जब कोई व्यक्ति या कंपनी जानबूझकर बैंक का कर्ज नहीं चुकाते हैं। जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले को ‘विलफुल डिफॉल्टर’ कहते हैं। इस तरह लगातार 90 दिन तक मूलधन या ब्याज की किश्त का भुगतान न होने पर लोन खाता एनपीए बन जाता है।

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